जब विरोध इतना बढ़ा कि प्रिंट्स को कुएं में फेंकना पड़ा था, छत्तीसगढ़ी सिनेमा का अनसुना अध्याय

छत्तीसगढ़ की पहली फिल्म ‘कही देबे सन्देस’ को रिलीज के दौरान भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। हालात ऐसे बन गए थे कि फिल्म की रीलों को सुरक्षित रखने के लिए निर्माताओं को उन्हें सूखे कुएं में छिपाना पड़ा।

Jun 26, 2026 - 18:47
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जब विरोध इतना बढ़ा कि प्रिंट्स को कुएं में फेंकना पड़ा था, छत्तीसगढ़ी सिनेमा का अनसुना अध्याय

रायपुर। छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं, जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और संघर्षपूर्ण अध्याय राज्य की पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कही देबे सन्देस’ से जुड़ा हुआ है। सामाजिक बदलाव का संदेश देने वाली इस फिल्म को रिलीज के समय जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था।

साल 1965 में रिलीज हुई ‘कही देबे सन्देस’ का निर्माण और निर्देशन मनु नायक ने किया था। फिल्म की कहानी अंतरजातीय प्रेम, छुआछूत और जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ थी। उस दौर में ऐसे विषयों पर खुलकर बात करना आसान नहीं था और यही वजह रही कि फिल्म कुछ रूढ़िवादी वर्गों के निशाने पर आ गई।

बताया जाता है कि फिल्म के प्रदर्शन को लेकर विरोध इतना बढ़ गया था कि रायपुर के प्रसिद्ध मनोहर टॉकीज को आग लगाने तक की धमकियां दी जाने लगी थीं। इससे फिल्म से जुड़े लोगों और थिएटर संचालकों के सामने सुरक्षा को लेकर गंभीर चुनौती खड़ी हो गई।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए फिल्म निर्माताओं ने एक अनोखा कदम उठाया। फिल्म की मूल रीलों (प्रिंट्स) को किसी नुकसान से बचाने के लिए उन्हें कुछ समय तक एक सूखे कुएं में छिपाकर रखा गया। उस दौर में फिल्म की रील ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती थी और उसके नष्ट होने का मतलब पूरी फिल्म का अस्तित्व खतरे में पड़ जाना था।

हालांकि तमाम विरोध और विवादों के बावजूद फिल्म ने अपना सफर जारी रखा और बाद में छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। आज ‘कही देबे सन्देस’ को केवल पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की आवाज उठाने वाली साहसी फिल्म के रूप में भी याद किया जाता है।

फिल्म से जुड़ा यह किस्सा बताता है कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा की नींव केवल मनोरंजन पर नहीं, बल्कि संघर्ष, सामाजिक चेतना और बदलाव की सोच पर भी रखी गई थी।

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