जब ‘कही देबे सन्देस’ पर उठा बवाल: इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप से बची छत्तीसगढ़ की पहली फिल्म
छत्तीसगढ़ की पहली फिल्म ‘कही देबे सन्देस’ को अंतरजातीय प्रेम और छुआछूत जैसे विषयों के कारण विरोध का सामना करना पड़ा था। विवाद बढ़ने पर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने फिल्म देखकर इसके प्रदर्शन का समर्थन किया।
रायपुर। छत्तीसगढ़ी सिनेमा का इतिहास कई दिलचस्प और प्रेरणादायक घटनाओं से भरा हुआ है। ऐसी ही एक घटना राज्य की पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कही देबे सन्देस’ से जुड़ी है, जिसने अपने समय में सामाजिक मुद्दों को पर्दे पर उतारकर बड़ी बहस छेड़ दी थी।
साल 1965 में रिलीज हुई इस फिल्म की कहानी अंतरजातीय प्रेम, सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाती थी। उस दौर में ऐसे संवेदनशील विषयों को लेकर समाज के एक वर्ग ने कड़ा विरोध जताया। रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में कुछ रूढ़िवादी समूहों ने फिल्म के प्रदर्शन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग तक कर डाली।
फिल्म को लेकर बढ़ते विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। मामला उस समय की सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंचा। बताया जाता है कि विवाद की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने स्वयं फिल्म देखी और इसके सामाजिक संदेश को सराहा।
फिल्म देखने के बाद इंदिरा गांधी ने इसे समाज में सकारात्मक बदलाव का संदेश देने वाली रचना माना। उनके समर्थन के बाद फिल्म के प्रदर्शन को लेकर बनी अनिश्चितता दूर हुई और इसे बिना किसी प्रतिबंध के रिलीज करने का रास्ता साफ हो गया।
छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास में यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह दर्शाती है कि क्षेत्रीय सिनेमा ने अपने शुरुआती दौर से ही सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील विचारों को प्रमुखता दी। ‘कही देबे सन्देस’ न केवल छत्तीसगढ़ की पहली फिल्म के रूप में याद की जाती है, बल्कि सामाजिक बदलाव के संदेश को लेकर खड़े हुए विवाद और उसके समाधान के लिए भी इतिहास में दर्ज है।
आज, जब छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री लगातार विस्तार कर रही है, तब ‘कही देबे सन्देस’ जैसी फिल्मों का योगदान नई पीढ़ी के कलाकारों और फिल्मकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
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