दिग्गज लेखक-निर्देशक वेद राही का 93 वर्ष की उम्र में निधन, ‘गुल गुलशन गुलफाम’ और ‘वीर सावरकर’ से बनाई खास पहचान
मशहूर डोगरी और हिंदी लेखक-निर्देशक वेद राही का 93 वर्ष की उम्र में ठाणे में निधन हो गया। ‘गुल गुलशन गुलफाम’, ‘प्रेम पर्वत’ और ‘वीर सावरकर’ जैसी कृतियों से बनाई पहचान।
भारतीय साहित्य और सिनेमा जगत से दुखद खबर सामने आई है। मशहूर लेखक, उपन्यासकार और फिल्म निर्देशक वेद राही का 93 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 1 नवंबर 2026 को महाराष्ट्र के ठाणे स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर है। वेद राही ने हिंदी सिनेमा के साथ-साथ डोगरी साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्हें एक ऐसे रचनाकार के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने लेखन, फिल्म निर्देशन और टेलीविजन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
वेद राही का जन्म मई 1933 में जम्मू में हुआ था। उनके पिता मुल्क राज सराफ क्षेत्र के प्रतिष्ठित पत्रकारों में गिने जाते थे। वेद राही ने अपने लेखन की शुरुआत डोगरी भाषा से की और कम उम्र में ही साहित्य जगत में पहचान बना ली। बाद में वे मुंबई पहुंचे और हिंदी फिल्म उद्योग में पटकथा लेखक के रूप में काम करने लगे। साहित्य और सिनेमा दोनों क्षेत्रों में उनकी सक्रियता ने उन्हें बहुआयामी रचनाकार के रूप में स्थापित किया।
हिंदी फिल्मों में वेद राही ने पटकथा और संवाद लेखन के जरिए कई चर्चित फिल्मों से जुड़कर काम किया। ‘ये रात फिर न आएगी’, ‘पवित्र पापी’, ‘आप आए बहार आई’, ‘बेईमान’, ‘सन्यासी’, ‘चरित्रहीन’ और ‘मोम की गुड़िया’ जैसी फिल्मों के लेखन में उनका योगदान रहा। उन्होंने करीब 25 फिल्मों के लिए लेखन किया और निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। उनकी कहानियों में सामाजिक जीवन, मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की गहरी समझ दिखाई देती थी।
निर्देशक के रूप में वेद राही की फिल्मों में ‘प्रेम पर्वत’, ‘काली घटा’, ‘अंधी सुरंग’ और ‘रात और तूफान’ का नाम उल्लेखनीय है। उनकी निर्देशित फिल्म ‘प्रेम पर्वत’ अपने संगीत और संवेदनशील कहानी के लिए जानी जाती है। वहीं ‘काली घटा’ में शशि कपूर, रेखा और डैनी डेंजोंगप्पा जैसे कलाकार नजर आए थे। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म ‘वीर सावरकर’ वर्ष 2001 में रिलीज हुई थी, जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के जीवन को पर्दे पर प्रस्तुत किया।
टेलीविजन की दुनिया में भी वेद राही का योगदान काफी महत्वपूर्ण रहा। दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक ‘गुल गुलशन गुलफाम’ से उन्हें देशभर में पहचान मिली। यह धारावाहिक कश्मीर में हाउसबोट पर रहने वाले एक परिवार की कहानी पर आधारित था। इसके अलावा उन्होंने ‘कथा सागर’, ‘जिंदगी’, ‘एहसास’, ‘रिश्ते’ और ‘मीरा’ जैसे धारावाहिकों से भी जुड़कर काम किया। उनके टेलीविजन कार्यों ने दर्शकों के बीच साहित्यिक कहानियों और संवेदनशील विषयों को लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई।
डोगरी साहित्य में उनके योगदान को भी कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 1983 में उनके डोगरी कहानी संग्रह ‘आले’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वर्ष 2024 में उन्हें साहित्य अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किया गया, जिसे अकादमी के सर्वोच्च सम्मानों में गिना जाता है। इसके अलावा उन्हें राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार और कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। उनके निधन पर साहित्य अकादमी और डोगरी साहित्य से जुड़ी संस्थाओं ने भी शोक व्यक्त किया।
वेद राही के निधन से भारतीय साहित्य, हिंदी सिनेमा और जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत को बड़ा नुकसान हुआ है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से डोगरी भाषा को व्यापक पहचान दिलाने के साथ हिंदी फिल्मों और टेलीविजन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी लिखी कहानियां, फिल्में और धारावाहिक आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी रचनात्मक विरासत बने रहेंगे।
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