छत्तीसगढ़ी सिनेमा की दूसरी फिल्म 'घर द्वार' (1971) की संघर्षभरी कहानी! 30 साल तक नहीं बनी एक भी नई मूवी

जानिए छत्तीसगढ़ी सिनेमा की दूसरी फिल्म 'घर द्वार' (1971) की संघर्षभरी कहानी। आर्थिक तंगी, थिएटर की कमी और बॉक्स ऑफिस फ्लॉप होने के बाद कैसे 30 साल तक छत्तीसगढ़ी सिनेमा ठहर गया।

Jul 21, 2026 - 18:57
Jul 21, 2026 - 18:59
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छत्तीसगढ़ी सिनेमा की दूसरी फिल्म 'घर द्वार' (1971) की संघर्षभरी कहानी! 30 साल तक नहीं बनी एक भी नई मूवी

छत्तीसगढ़ी सिनेमा का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही संघर्षों से भी भरा रहा है। पहली फिल्म 'कही देबे संदेस' (1965) के बाद दर्शकों को दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर द्वार' (1971) का इंतजार करना पड़ा। लेकिन इस फिल्म के बनने और रिलीज होने के पीछे ऐसी मुश्किलें थीं, जिन्होंने पूरे छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग को लगभग तीन दशकों तक ठहराव में पहुंचा दिया।

वर्ष 1971 में रिलीज हुई 'घर द्वार' छत्तीसगढ़ी भाषा की दूसरी फीचर फिल्म थी। इसका निर्माण विजय कुमार पांडेय ने किया था, जबकि निर्देशन निरंजन तिवारी ने संभाला था। फिल्म बनने में करीब छह साल लग गए। निर्माता ने 1965 में इसका सपना देखा था, लेकिन आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के कारण यह 1971 में जाकर रिलीज हो सकी।

फिल्म के निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती पैसों की कमी थी। लंबे समय तक शूटिंग खिंचने से लागत लगातार बढ़ती गई। सीमित संसाधनों के बावजूद निर्माता ने किसी तरह फिल्म पूरी की, लेकिन यह संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ।

उस दौर में छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए कोई मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क मौजूद नहीं था। हिंदी फिल्मों के दबदबे के कारण स्थानीय भाषा की फिल्मों को सिनेमाघरों में पर्याप्त शो नहीं मिलते थे। इसी वजह से 'घर द्वार' भी सीमित दर्शकों तक ही पहुंच सकी।

फिल्म में सुमन कल्याणपुर जैसे बड़े गायकों की आवाज और अच्छी कहानी होने के बावजूद यह बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाई। फिल्म अपनी लागत तक नहीं निकाल सकी और निर्माताओं को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।

तकनीकी सुविधाओं का अभाव भी बड़ी समस्या था। उस समय छत्तीसगढ़ में न तो कोई फिल्म स्टूडियो था और न ही एडिटिंग या प्रोसेसिंग की सुविधाएं। कैमरे, तकनीकी उपकरण, पोस्ट-प्रोडक्शन और फिल्म प्रोसेसिंग के लिए पूरी टीम को मुंबई सहित दूसरे बड़े शहरों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे खर्च और बढ़ गया।

'घर द्वार' की असफलता का असर सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा। इस नुकसान ने छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माण का उत्साह लगभग खत्म कर दिया और करीब 29-30 वर्षों तक कोई नई छत्तीसगढ़ी फिल्म नहीं बन सकी।

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