चित्रोप्ला फिल्म सिटी: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा एक समकालीन सांस्कृतिक निर्णय

चित्रोप्ला फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, लोककला और आधुनिक सिनेमा को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण पहल है, जो राज्य की रचनात्मक पहचान को नया आयाम दे सकती है।

Feb 7, 2026 - 16:35
Feb 7, 2026 - 19:23
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चित्रोप्ला फिल्म सिटी: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा एक समकालीन सांस्कृतिक निर्णय

चित्रोप्ला : छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक समकालीन सांस्कृतिक निर्णय

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रस्तावितचित्रोप्ला फिल्म सिटी के नामकरण को लेकर सार्वजनिक विमर्श स्वाभाविक है। संस्कृति से जुड़े किसी भी निर्णय पर प्रश्न उठना और उस पर संवाद होना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा है। एक सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में, जिसने वर्षों तक छत्तीसगढ़ की कला, परंपरा और सांस्कृतिक इतिहास के साथ प्रत्यक्ष रूप से काम किया है, यह आवश्यक समझता हूँ कि “चित्रोप्ला” नाम के सांस्कृतिक आशय और इस परियोजना की व्यापक दृष्टि को स्पष्ट किया जाए।

महाकोशल (दक्षिण कोशल) : छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक भूमि

आज का छत्तीसगढ़ प्राचीन काल में दक्षिण कोशल अथवा महाकोशल के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र कभी केवल राजनीतिक सत्ता का केंद्र नहीं रहा, बल्कि यहाँ की पहचान लोकजीवन, कला, आस्था और रचनात्मक अभिव्यक्तियों से निर्मित हुई है। इतिहास के विभिन्न चरणों में यहाँ बड़े साम्राज्य आए और गए, पर स्थानीय संस्कृति की निरंतरता बनी रही।

गुप्तोत्तर काल के बाद, लगभग 7वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी के बीच, इस क्षेत्र में अनेक क्षेत्रीय शासक वंश और सांस्कृतिक इकाइयाँ सक्रिय रहीं। इन्हीं में से एक के रूप में चित्रोप्ला वंश का उल्लेख क्षेत्रीय इतिहास और लोकस्मृति में मिलता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि चित्रोपला वंश को किसी विशाल साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत करना न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है और न ही अपेक्षित। इसका महत्व एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में है।

“चित्रोप्ला” : एक सांस्कृतिक संकेत

“चित्रोप्ला” शब्द को सामान्यतः चित्र (दृश्य अभिव्यक्ति, कला) और पालन अथवा संरक्षण की अवधारणा से जोड़कर समझा जाता है। यह व्युत्पत्ति अपने आप में उस सांस्कृतिक दृष्टि की ओर संकेत करती है, जिसमें कला और कलाकार समाज की केंद्रीय धुरी माने जाते थे।

छत्तीसगढ़ की भित्ति चित्र परंपरा, लोकचित्र, शिल्प, मंदिर स्थापत्य और मौखिक कथाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र सदियों से दृश्य कथा कहने वाली संस्कृति रहा है। इसलिए “चित्रोप्ला” नाम किसी काल्पनिक गौरव का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक निरंतरता का द्योतक है।

लोककला और आधुनिक दृश्य माध्यम

यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक सिनेमा, वेब सीरीज़ और दृश्य-श्रव्य माध्यम छत्तीसगढ़ की संस्कृति के लिए कोई बाहरी तत्व नहीं हैं। ये उसी लोकपरंपरा का आधुनिक रूप हैं, जिसमें कथा, दृश्य और संगीत के माध्यम से समाज स्वयं को अभिव्यक्त करता रहा है।

पंथी, राउत नाचा, लोकगीत, जनजातीय प्रतीकात्मक चित्रण—ये सभी मूलतः विज़ुअल नैरेटिव हैं। तकनीक ने केवल इनके प्रस्तुतीकरण का माध्यम बदला है, आत्मा नहीं।


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चित्रोप्ला फिल्म सिटी : एक सांस्कृतिक–आर्थिक पहल

छत्तीसगढ़ शासन की चित्रोपला फिल्म सिटी परियोजना को केवल एक निर्माण परियोजना के रूप में देखना इसके उद्देश्य को सीमित कर देगा। यह पहल दरअसल राज्य की सांस्कृतिक नीति और रचनात्मक अर्थव्यवस्था को जोड़ने का प्रयास है।

इस परियोजना का उद्देश्य—

छत्तीसगढ़ी सिनेमा को स्थायी आधार देना

स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को राज्य के भीतर अवसर उपलब्ध कराना

लोककथाओं और स्थानीय कथ्य को आधुनिक माध्यमों तक पहुँचाना


एक सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में मेरा अनुभव यह कहता है कि जब तक संस्कृति को आर्थिक और संस्थागत समर्थन नहीं मिलता, तब तक वह केवल उत्सवों और आयोजनों तक सीमित रह जाती है। चित्रोपला फिल्म सिटी इस स्थिति को बदलने का अवसर प्रदान करती है।

शासन की भूमिका : संरक्षक की परंपरा

इतिहास में जिन समाजों की सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ रही, वहाँ शासन ने केवल नियामक की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि संरक्षक की भूमिका भी निभाई। चित्रोप्ला नाम से फिल्म सिटी का प्रस्ताव उसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है।

यह अपेक्षित है कि यह परियोजना स्थानीय कथाओं, स्थानीय कलाकारों और स्थानीय दृष्टि को केंद्र में रखे। तभी “चित्रोपला” नाम सार्थक होगा।

निष्कर्ष

चित्रोप्ला फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ के लिए एक अवसर है—
अपनी सांस्कृतिक स्मृति को वर्तमान की भाषा में व्यक्त करने का अवसर।
यह परियोजना यह संदेश देती है कि छत्तीसगढ़ विकास के पथ पर चलते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख नहीं है।

यदि इसे सही दृष्टि, संवेदनशीलता और निरंतर संवाद के साथ विकसित किया गया, तो “चित्रोपला” आने वाले समय में केवल एक फिल्म सिटी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की रचनात्मक पहचान का प्रतीक बन सकती है।

राजीव श्रीवास्तव
पूर्व संस्कृति आयुक्त
छत्तीसगढ़

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