छत्तीसगढ़ के अनपढ़ कलाकार जिन्होंने बिना स्कूल पढ़े भी दिलों पर राज किया
छत्तीसगढ़ के कुछ महान कलाकार जिन्होंने औपचारिक स्कूल शिक्षा नहीं पाई, लेकिन अपनी कला, पंडवानी, पंथी और लोकगीत से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और लाखों दिलों को जीत लिया।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक कला ने देश भर में अपनी अनूठी पहचान बनाई है, लेकिन कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जिन्होंने कभी औपचारिक स्कूल की शिक्षा नहीं ली, फिर भी अपनी प्रतिभा और कला के दम पर लाखों दिलों पर राज किया है। इन कलाकारों की कहानी यह साबित करती है कि असली शिक्षा सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि जीवन और कला के अनुभवों में भी होती है।
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पंडवानी की महान कलाकार हैं, जिन्हें कभी स्कूल का मौका नहीं मिला। लेकिन पंडवानी की जीवंत प्रस्तुति और अभिव्यक्ति की अनोखी शैली ने उन्हें देश-विदेश में पहचान दिलाई। उनकी गायकी में सहजता और भावनात्मक गहराई के कारण पंडवानी को लोक कला के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला, और उन्हें पद्मविभूषण सहित सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया।
पंथी नृत्य की संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने वाले पद्मश्री डॉ. राधेश्याम बारले भी शिक्षा के नियमित सफर से बाहर थे। गुरु घासीदास जी के उपदेश और सतनाम पंथ की गहराई को अपने नृत्य में पिरोकर उन्होंने छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति को नए दर्शकों तक पहुँचाया। उनकी प्रस्तुतियाँ न केवल राज्य के भीतर, बल्कि देशभर के सांस्कृतिक समारोहों में सराही गईं।
लोकगीत के क्षेत्र में गोविंदराम निषाद जैसे कलाकारों ने बिना औपचारिक शिक्षा के भी ऐसा मुकाम हासिल किया कि उनके गीतों में छत्तीसगढ़ की मिट्टी और भावना दोनों बस गई हैं। खेत-खिलौनों से उठकर राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचना उनके जीवन की सबसे प्रेरक बातें है। उनकी आवाज़ ने लोकगीतों को एक नई आवाज़ दी और अलग वर्गों के श्रोताओं के दिलों को छू लिया।
इन सबकी यात्रा यह संदेश देती है कि कला और जुनून के सामने किसी भी बाधा का कोई वज़न नहीं होता। बिना स्कूल देखे भी, अगर दिल में कला के लिए सच्चा समर्पण है, तो व्यक्ति कठिन संघर्ष को पार करके भी राष्ट्रीय पहचान पा सकता है। छत्तीसगढ़ के ये कलाकार आज सिर्फ़ कलाकार नहीं, बल्कि जिंदगी को जीने का ज़ोरदार उदाहरण हैं।
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