रायपुर : छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति के इतिहास में जब भी सिनेमा का नाम लिया जाएगा, निर्माता-निर्देशक मनु नायक का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा। आज छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री (छॉलीवुड) जिस मुकाम पर है, उसकी नींव 1965 में मनु नायक ने अपनी दूरदर्शिता और साहस से रखी थी।
1965: 'कहि देबे संदेस' के साथ एक नए युग का आगाज
मनु नायक ने साल 1965 में छत्तीसगढ़ी भाषा की पहली फिल्म 'कहि देबे संदेस' बनाकर एक इतिहास रचा। उस दौर में जब क्षेत्रीय सिनेमा का प्रभाव सीमित था, मनु नायक ने अपनी माटी की बोली को बड़े पर्दे पर उतारने का जोखिम उठाया। यह फिल्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं थी, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ एक सशक्त आवाज थी।
सिनेमा के जरिए सामाजिक क्रांति
'कहि देबे संदेस' की कहानी अंतरजातीय प्रेम और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों पर आधारित थी। फिल्म ने उस दौर के रूढ़िवादी समाज को आइना दिखाने का काम किया। हालांकि, फिल्म को अपनी क्रांतिकारी विषयवस्तु के कारण तत्कालीन समय में विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन मनु नायक के दृढ़ संकल्प ने इसे सफल बनाया।
ऐतिहासिक उपलब्धि और सम्मान
मनु नायक की इस फिल्म को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा भी सराहा गया था। इस फिल्म ने छत्तीसगढ़ी पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। फिल्म जगत के जानकार मानते हैं कि मनु नायक ने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस तकनीक और भावुकता के साथ इस फिल्म को बनाया, वह आज के फिल्मकारों के लिए एक पाठ्यपुस्तक की तरह है।
छत्तीसगढ़ी अस्मिता का प्रतीक
आज छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग सालाना करोड़ों का कारोबार कर रहा है, लेकिन इसकी जड़ें मनु नायक की उसी सोच में टिकी हैं, जिसने 60 के दशक में 'छत्तीसगढ़ी' होने पर गर्व करना सिखाया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें छत्तीसगढ़ी सिनेमा का 'जनक' कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति उनका समर्पण आज भी नई पीढ़ी के निर्देशकों और कलाकारों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।